सरकार के नियंत्रण में होंगे विग को चिपकाने व कृत्रिम उत्पाद

गंजे सिर पर बाल व विग चिपकाने में इस्तेमाल होने वाले सभी उत्पाद पर अब केंद्रीय दवा मानक नियंत्रण संगठन (सी.डी.एस.सी.ओ.) का नियंत्रण होगा। यही नहीं, कृत्रिम नाखून के उत्पाद भी सी.डी.एस.सी.ओ. के नियंत्रण में होंगे। सी.डी.एस.सी.ओ. ने इन सभी उत्पादों को ड्रग और कॉस्मैटिक्स एक्ट 1940 की कॉस्मैटिक्स परिभाषा के तहत कवर किया है। इनमें गोंद व वे सभी उत्पाद जो विग व बाल चिपकाने में इस्तेमाल होते हैं, इसके दायरे में आ गए हैं। इसके लिए सी.डी.एस.सी.ओ. ने सभी स्टेक होल्डर से 30 दिन के अंदर उनके कमैंट मांगे हैं।

ड्रग और कॉस्मैटिक्स एक्ट 1940 के तहत आने के बाद सी.डी.एस.सी.ओ. अब बाजार से इन उत्पादों के सैंपल एकत्रित कर सकता है। सैंपल फेल होने पर संबंधित कंपनी के खिलाफ कार्रवाई भी की जा सकती है।

बाल व विग को चिपकाने में इस्तेमाल होने वाले गोंद व सिर की सफाई के लिए इस्तेमाल होने वाले उत्पाद को कॉस्मैटिक्स गाइडलाइन के कॉलम 3 में प्रोडक्ट फॉर टैंपरेरी हेयर्ज श्रेणी में रखा गया है।

इसी तरह कृत्रिम नाखून के उत्पाद को कृत्रिम नाखून सिस्टम की श्रेणी में रखा गया है। अब ये सभी उत्पाद सी.डी.एस.सी.ओ. के नियंत्रण में आ गए हैं जिससे इनके उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार के साथ-साथ कंपनियों की जवाबदेही भी तय होगी।

सी.डी.एस.सी.ओ. के दवा नियंत्रक जनरल डी.वी.जे. सोमनी ने इस बारे एक नोटिस जारी कर सभी स्टेक होल्डर से इसकी अधिसूचना जारी होने के 30 दिन के अंदर कमैंट मांगे हैं।

रैपर पर लिखना होगा इसके प्रयोग से किडनी पर पड़ सकता है असर सी.डी.एस.सी.ओ. ने देश के सभी राज्यों के दवा नियंत्रकों को पत्र लिखकर ये निर्देश जारी किए हैं कि अब दवा कंपनियों को दवा के रैपर पर यह लिखना जरूरी होगा कि इसके प्रयोग से किडनी पर असर पड़ सकता है।

आई.पी.सी. की सलाह पर यह कदम उठाया गया है। विशेषकर गैस्ट्रिक के इलाज में ली जाने वाली पैंटा प्राजोल, ओमिप्राजोल, लैंसाप्राजोल, इसोमे प्राजोल व रेबिप्राजोल सहित कई दवाओं के इस्तेमाल का किडनी पर असर पड़ता है। इसके अलावा भी लोग बुखार, शरीर और जोड़ों में छोटे-मोटे दर्द के लिए डाक्टर की सलाह के बिना ही दवा का सेवन कर लेते हंै। किडनी खराब होने के अधिकांश मामले इसके कारण भी आ रहे हैं।

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