पूर्व मुख्यमंत्री धूमल को पच्छाद में लाना मजबूरी थी या कुछ और

पूर्व मुख्यमंत्री धूमल को पच्छाद में लाना मजबूरी थी या कुछ और
पूर्व मुख्यमंत्री धूमल को पच्छाद में लाना मजबूरी थी या कुछ और

पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल पच्छाद आए भी और भाजपा प्रत्याशी रीना कश्यप के लिए चुनाव प्रचार करके चले भी गए । लेकिन उनका ये दौरा पच्छाद की वादियों मे राजनीतिक गर्म हवाओं का वातावरण बना गया । पूर्व मुख्यमंत्री के दौरे की चर्चा उनके 12 अक्तूबर के दौरे के बाद आज भी गर्म है । धूमल का पच्छाद का दो दिन का दौरा था लेकिन वो एक ही दिन मे वापिस लौट गए जो कहीं ना कहीं उनकी नाराजगी को दर्शाता है । कल तक जो लोग दबी जुबान मे इस बात का जिक्र तक नहीं करते थे आज खुलकर इस बात पर चर्चा कर रहे है कि क्या धूमल को लाना भाजपा की मजबूरी थी या फिर कुछ और। वहीं रीना कश्यप का पूर्व मुख्यमंत्री की दोनों जनसभाओं से दूरी बनाना और उसके बाद धूमल का रीना कश्यप का मंच से नाम तक नहीं लेना एक तूफान के आने से पहले वाली शांति को दर्शाता है। अगर ऐसा हुआ तो उप चुनावों के नतीजों के बाद भाजपा मे कोई बड़ा परिवर्तन हो तो कोई बड़ी बात नहीं।

कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष कुलदीप राठौर भी आरोप लगाकर गए कि बीजेपी मे निर्दलीय चुनाव लड़ रहे है और बीजेपी वर्सेस बीजेपी की लड़ाई चल रही है। इस लड़ाई मे भाजपा उम्मीदवार काफी पीछे चल रही है और निर्दलीय के साथ ही कांग्रेस उम्मीदवार की चुनावी जंग है।

हालांकि पूर्व मुख्यमंत्री को बुलाया जाना एक खास रणनीति का हिस्सा था मगर यहां भी बड़ी बात यह रही कि दोनों चुनावी सभा में ना तो भाजपा प्रत्याशी रीना कश्यप मौजूद रही और ना ही पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने भाषण में दोनों जगह उनका कहीं नाम लिया।

धूमल ने दोनों सभाओं मे सिर्फ 370 व अपने समय मे किए गए कार्यों का बखान किया । थर्ड आई से हुई बातचीत मे उनसे इस बात को लेकर प्रश्न भी किया गया था कि निर्दलीय उम्मीदवार दयाल प्यारी को आपका आशीर्वाद है तो उन्होने इसे बेतुका प्रश्न बताते हुए अपना पल्ला झाड लिया था और उसके बाद वो भाजपा प्रत्याशी के लिए जनसभा करने भी गए । लेकिन दोनों सभाओं मे भाजपा उम्मीदवार का ना आना कहीं रीना कश्यप के लिए गले की फांस ना बन जाए । क्योकि पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की तरह प्रेम कुमार धूमल का भी अपना जनाधार है जो आज भी इस नेताओं के हर इशारे का इंतजार करते है ।  धूमल का मंच से एक बार भी भाजपा प्रत्याशी का नाम नहीं लेना कहीं इस बात का इशारा तो नहीं कर रहा कि वो आए तो जरूर है लेकिन उनका आशीर्वाद किस और है उसका इशारा उनके समर्थक खुद समझे ।

वैसे भी दयाल प्यारी के साथ अभी भी लोगों की सहानुभूति जुड़ी हुई है और उन्हे किसी भी सूरत मे कम नहीं आंका जा सकता । वहीं कांग्रेस के उम्मीदवार गंगुराम मुसाफिर भी दोनों की लड़ाई मे अपना फायदा ढूंढ रहे है । जबकि रीना कश्यप के लिए चुनावी रणनीतिकार महेंद्र कुमार, राजीव बिंदल मैदान मे डटे हुए है । इसके अलावा राजीव सैजल, बलदेव भंडारी, चंद्र मोहन जैसे अनुभवी नेता अपने अनुभव के दम पर भाजपा का कमल खिलाने के लिए तैयार बैठे है ।

नतीजा चाहे कुछ भी हो लेकिन प्रेम कुमार धूमल की जनसभा लोगों मे चर्चा जरूर छोड़ गई ।   

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