पीरन में भैया दूज पर आयोजित मेला धूमधाम से मनाया गया

पीरन में भैया दूज पर आयोजित मेला धूमधाम से मनाया गया
पीरन में भैया दूज पर आयोजित मेला धूमधाम से मनाया गया

राजगढ़ के समीप पीरन में भैया दूज पर मनाया जाने वाला मेला मंगलवार की सांय को धूमधाम के साथ संपन्न हुआ। मेले में पंचायत प्रधान अतर सिंह ठाकुर ने बतौर मुख्यातिथि शिरकत की। इस मौके पर प्रसिद्ध लोकगायक देवेन्द्र कुमार द्वारा अपनी सुरीली आवाज में जौबे न आईदा, न आईंदा-शांगरी गांवटे तेरे नहीं आईंदा नामक नाटी पर मेले में आए लोग झूम उठे और पांडाल में आकर नृत्य करने लगे।

मेले की सांस्कृतिक संध्या का आगाज चेष्ठा कला मंच शलेच के कलाकारों द्वारा शिव कैलाशों रे वासी नामक शिव वंदना से किया। इसके उपरांत लोकगायक देवेन्द्र कुमार ने एक से एक नाटी गाकर लोगों को मंत्र मुग्ध कर दिया। इसके अतिरिक्त उभरती युवा लोक गायिका ममता ठाकुर द्वारा  हाथ कटा पईनी दाचीए मेरे नामक नाटी सहित गीतमाला प्रस्तुत करके  विशेषकर युवाओं को भावविभोर कर दिया।

चेष्टा कला मंच के कलाकारों द्वारा हास्य नाटिका शराबी प्रस्तुत करके लोगों को हंसाकर लोटपोट कर दिया । इस नाटिका में कलाकारों द्वारा पहाड़ी भाषा में स्थानीय लोगों व्यंग्य बाण चलाकार मेेले में आए लोगों का भरपूर मनोरंजन किया गया ।

इस मौके पर पंचायत प्रधान अतर सिंह ठाकुर ने कहा कि भैयादूज पर पीरन में पीठासीन देवता जुन्गा के नाम पर  कालांतर से मेला आयोजित किया जाता है जिससे सबसे पहले स्थानीय लोगों द्वारा ढोल नगाड़ों के साथ शोभा यात्रा निकाली जाती है उसके पश्चात जुब्बड़ अर्थात गांव के बीच स्थित 22 टीका के स्थान पर स्थानीय देवता के गुर से मेले की इजाजत ली जाती है। उसके पश्चात मेला आरंभ होता है । उन्होने कहा कि लोगों का विश्वास है कि पीठासीन देवता के नाम पर मनाए जाने वाले इस मेले के आयोजन से क्षेत्र में सुख समृद्धि और खुशहाली का सूत्रपात होता है ।

गांव के वरिष्ठ नागरिक दौलत राम का कहना है कि इस प्राचीन मेले  को देखने दूर दूर से लोग आते है। गांव की विवाहित बेटियां भी भैयादूज पर अपने कुलदेवता का आर्शिवाद पाने के लिए आती है। उन्होने कहा कि दीवाली का पर्व गांव में एक सप्ताह तक मनाया जाता है जिसमें दिवाली के दो दिन पहले मुड़ी अर्थात मड़ेगों मनाने है जिसमें गेहूं, रौगी इत्यादि की मूड़ी बनाकर इसे अखरोट के साथ खाते है । इसके दूसरे दिन अस्कलायन होती है इस दिन लोग अस्कलियां बनाते है जिसे शक्कर घी अथवा शहद के साथ खाते है । दिवाली के पर्व पर खीर पटांडे तथा पड़वा और भैयादूज पर खिचड़ी बनाते है । उन्होने दौरान स्थानीय देवेता के नाम पर रात भर जागरण किया जाता है जिसे स्थानीय भाषा में घैना कहते है ।

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