भक्ति भाव से सराबोर भक्ति पर्व समागम का दिव्य आयोजन
सन्त निरंकारी सत्संग भवन सोलन मे आज भक्ति पर्व के अवसर पर सत्संग का आयोजन किया गया व सोलन क्षेत्र के साथ लगती हुई ब्रांचों से अनेक श्रद्धालुओं ने सत्संग का आनन्द प्राप्त किया वहीं वक्ताओं ने सतगुरू की शिक्षाओं को जीवन में उतारने से जीवन किस प्रकार भक्ति से महक उठता है, इन सब पहलुओं पर प्रकाश डाला। सोलन जोन के जोनल इंचार्ज विवेक कालिया ने बताया कि संपूर्ण निरंकारी जगत में आज इस पर्व को मनाया गया वहीं हरियाणा स्थित संत निरंकारी आध्यात्मिक स्थल, समालखा में आयोजित ‘भक्ति पर्व समागम’ के पावन अवसर पर श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए अपने प्रेणादायी विचारों में निरंकारी सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने कहा कि ‘भक्ति केवल शब्द नहीं जीवन जीने की सजग यात्रा है”
इस अवसर पर सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज एवं निरंकारी राजपिता रमित जी के पावन सान्निध्य में श्रद्धा, भक्ति एवं आध्यात्मिक उल्लास की अनुपम छटा देखने को मिली। दिल्ली-एन.सी.आर सहित देश-विदेश से पधारे हजारों श्रद्धालु भक्तों ने इस दिव्य संत समागम में सहभागिता करते हुए सत्संग के माध्यम से आध्यात्मिक आनंद एवं आत्मिक शांति की अनुभूति प्राप्त की।
इस पावन अवसर पर परम संत संतोख सिंह जी सहित अन्य संत महापुरुषों के तप, त्याग एवं उनके ब्रह्मज्ञान के प्रचार-प्रसार में दिए गए अमूल्य योगदान का भावपूर्ण स्मरण किया गया। श्रद्धालुओं ने उनके जीवन से प्रेरणा लेकर भक्ति, सेवा एवं समर्पण के मूल्यों को आत्मसात करने का संकल्प लिया।
समागम के दौरान अनेक वक्ताओं, कवियों एवं गीतकारों ने अपनी-अपनी विधाओं के माध्यम से गुरु महिमा, भक्ति भाव और मानव कल्याण के संदेशों को अत्यंत भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया। संतों की प्रेरणादायक शिक्षाओं ने उपस्थित श्रद्धालुओं के हृदय को छूते हुए उनके जीवन को आध्यात्मिक दृष्टि से समृद्ध किया।
भक्ति की महिमा पर प्रकाश डालते हुए सतगुरु माता जी ने कहा कि भक्ति कोई नाम या दिखावा नहीं, बल्कि अपने भीतर की सजग यात्रा है। सच्ची भक्ति तब है जब हम आत्म मंथन द्वारा दूसरों से पहले स्वयं को जाँचें, अपनी कमियों को सुधारें और हर पल जागरूक जीवन जिएँ। अज्ञान में हुई गलती सुधर सकती है, पर जानबूझकर चोट पहुँचाना, बहाने या चालाक शब्द भक्ति नहीं हैं, क्योंकि भक्त का स्वभाव मरहम का होता है। हर एक में निराकार देखकर सरल, निष्कपट व्यवहार करना और ब्रह्मज्ञान के बाद सेवा, सुमिरन व सत्संग से इस एहसास को बनाए रखना ही भक्ति है। अंततः भक्ति एक चुनाव है-नाम की नहीं, जीवन की।

